मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......मैं ही यजमान मैं ही यज्ञ का होता हूं........पसन्द नहीं है उसको फूल पत्ती और गुलकन्दवह भूखा तड़पता होता और वे खा रहे होते कलाकन्दआंसू पोंछ कर गले स्नेह से लगाना पर्याप्त हैहवन कर निज का दुःख दारिद्र मिटाना ...
आगे पढ़ें...