मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......
मैं ही यजमान मैं ही यज्ञ का होता हूं........
पसन्द नहीं है उसको फूल पत्ती और गुलकन्द
वह भूखा तड़पता होता और वे खा रहे होते कलाकन्द
आंसू पोंछ कर गले स्नेह से लगाना पर्याप्त है
हवन कर निज का दुःख दारिद्र मिटाना पर्याप्त है
समर्पित निज को कर स्वयं हवन बन लेता हूं
मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......
बड़े बड़े महलों राजप्रसाद किसके लिए
धन वैभव संपत्ति जायजाद किसके लिए
छोड़कर हाथ खुले चल देना होगा एक दिन
रह जाना होगा धरा का धरा यहां बिखरा हुआ
इसलिए मैं अपना सारा उपवन दे देता हूं
मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......
जो जीवित है श्रद्धा नहीं उसके प्रति
बाद मृत्यु श्राद्ध की क्या आवश्यकता
भोग छप्पन चढ़ाये जाते बाद मरने के
जीताजी रूला रूला कर लड़पाने की क्या आवश्यकता
श्राद्ध नहीं मैं श्रद्धा को वरमाला पहना देता हूं
मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं......
-.कृष्णशंकर सोनाने
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