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5 अक्टूबर, 2008


ब्लॉग्स (3)
बहुत पुराने समय की बात है ,किसी शहर में हरिहर नाम का एक कृष्‍ण भक्‍त रहा करता था । वह प्रतिदिन भोर में शहर के तालाब के किनारे निर्मित कृष्‍ण मन्दिर में जाकर दीपक जलाया करता था । हरिहर बडा ही भक्त,सत्‍यनिष्‍ठ तथा विनम्र स्‍वभाव का व्‍यक्ति था । वह ... आगे पढ़ें...

उसे यह पता नहीं कि उसका यह नाम कैसे पड़ा । कोई कहता उसके पिता मुस्लिम थे और मां हिन्दू तो कोई कहता उसकी मां मुस्लिम थी और पिता हिन्दू । कोई कोई और कुछ कहता लेकिन जबसे उसने होश संभाला है तब से उसे यह आभास होने लगा है कि वह हिन्दू भी है ... आगे पढ़ें...

मैं कविता रचता हूंरचता क्या हूंप्रियतमाओं के मुखड़े निहारता हूंऔर पत्थरों से सिर टकराता हूं ।मैं कविता रचता हूंफूलों का रस और रसों की सुगन्धइस तरह चुरा लेता हूंजिस तरह किसी के आंख का काजलकोई चुरा लेता है।मैं रचता हूं कविताऔर चुपचापगिन लेता हूं पंखउड़ती ... आगे पढ़ें...